प्राचीन झारखण्ड का परिचय
झारखण्ड का परिचय: इतिहास, भूगोल, जनजातियाँ, संस्कृति एवं अर्थव्यवस्था (सम्पूर्ण गाइड)
झारखण्ड का क्षेत्रीय मानचित्र – छोटानागपुर और संथाल परगना
📌 संक्षिप्त सार: झारखण्ड भारत का 28वाँ राज्य है, जो 15 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आया। यह राज्य प्राकृतिक संपदा, खनिज संसाधनों, आदिवासी संस्कृति और समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है। इस लेख में झारखण्ड के इतिहास, भूगोल, जनजातियों, कृषि, खनिज, शिक्षा और राज्य निर्माण आंदोलन की विस्तृत जानकारी दी गई है।
📑 विषय-सूची (Table of Contents)
- झारखण्ड का नामकरण
- झारखण्ड का मध्यकालीन इतिहास
- मुगल काल में झारखण्ड
- अंग्रेजी शासन और जनजातीय विद्रोह
- झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन
- झारखण्ड का भूगोल एवं प्राकृतिक स्वरूप
- झारखण्ड की नदियाँ
- झारखण्ड के पशु एवं वन्यजीव
- आवास-प्रवास
- जीवनकाल एवं जनसांख्यिकी
- धर्म और जातियाँ
- झारखण्ड की आदिम जातियाँ (जनजातियाँ)
- खेती और फसल उत्पादन
- झारखण्ड में खनिज पदार्थ एवं उद्योग
- रेलवे एवं सड़क परिवहन
- झारखण्ड में शिक्षा
- प्रागैतिहासिक काल (पाषाण काल)
- नवपाषाण युग के बाद झारखण्ड
- झारखण्ड में जनजातियों का प्रवेश
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. झारखण्ड का नामकरण
झारखण्ड का वह क्षेत्र जो आज छोटानागपुर के नाम से जाना जाता है, प्राचीन संस्कृत साहित्य, प्रारंभिक विदेशी यात्रियों के वर्णनों और मध्यकालीन फारसी इतिहास-ग्रंथों में विभिन्न नामों से चर्चित है।
प्राचीन काल में झारखण्ड के नाम
- यूनानी लेखक प्लिनी ने झारखण्ड को 'पाटलिबोथ्रिस' (पाटलिपुत्र) से सुदूर दक्षिण में 'मोनेडेस' और 'सुआरी' कहे जाने वाले लोगों का निवास स्थान बताया। ये लोग संभवतः आधुनिक मुण्डा और प्राचीन शबर जाति के लोग ही थे।
- टॉलमी ने भी उपर्युक्त लोगों का 'मुडाला' और 'सुन्नराई' नाम से उल्लेख किया है।
- ह्वेनसांग द्वारा लिखित 'कि-लो-ना-सु-फा-ना' अथवा 'कर्णसुवर्ण' भी छोटानागपुर की अधित्यका को ही इंगित करता है।
- ह्वेनसांग से भी पहले फाहियान ने इस पहाड़ी इलाके का उल्लेख 'कुक्कुट-लाड' के नाम से किया है।
वैदिक एवं पौराणिक साहित्य में उल्लेख
- वैदिक साहित्य में झारखण्ड का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है।
- महाभारत के 'दिग्विजय-पर्व' में इस क्षेत्र का 'पुंडरिकदेश' के नाम से उल्लेख हुआ है।
- महाभारत की 'पशुभूमि' भी संभवतः झारखण्ड ही है, क्योंकि इस प्रदेश का नामकरण जंगली जानवरों के बाहुल्य के कारण हुआ था।
- बौद्ध एवं जैन साहित्य में इस क्षेत्र का नाममात्र ही उल्लेख है।
- 'इंडिया एण्ड जम्बू आइलैंड' के लेखक अमरनाथ दास ने झारखण्ड का संबंध गौतम बुद्ध तथा महावीर से जोड़ने का प्रयास किया है।
'भूम' प्रत्यय और क्षेत्रीय नाम
शरतचन्द्र राय का कहना है कि झारखण्ड के अनेक स्थानों के नाम के साथ 'भूम' प्रत्यय जुड़ा हुआ मिलता है, जैसे — मानभूम, सिंहभूम, धालभूम, भंजभूम और मल्लभूम। 'रसिक मंगल' नामक ग्रंथ में छोटानागपुर 'नागभूम' के नाम से गिनाया गया है।
मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकारों में उल्लेख
मध्यकाल में मुस्लिम इतिहासकारों ने सामान्यतः झारखण्ड का उल्लेख किया है। शम्स-ए-शिराज अफीफ, सुल्लिमुल्ल तथा गुलाम हुसैन ने अपने ग्रंथों में झारखण्ड नाम का प्रयोग किया है।
💡 'झारखण्ड' शब्द की उत्पत्ति: यहाँ जंगल और झाड़ की अधिकता के कारण इसका नाम झार/झाड़ (वन) + खण्ड (प्रदेश) पड़ा। इस प्रकार, झारखण्ड का शाब्दिक अर्थ है — "वन प्रदेश"। आज का झारखण्ड पहले के छोटानागपुर-संथाल परगना का ही पर्यायवाची है।
छोटानागपुर का नामकरण
छोटानागपुर, झारखण्ड का सबसे बड़ा भाग है। ढीले-ढाले अर्थ में छोटानागपुर को झारखण्ड का सामानार्थी कहा जा सकता है।
- फाहियान ने छोटानागपुर पठार को 'कुक्कुट लाड' कहा।
- ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत 'सी-यू-की' में छोटानागपुर पठार को 'किलों-ना-सु-का-ला-ना' (अर्थात् कर्ण सुवर्ण) कहा।
- मध्यकाल में राँची क्षेत्र 'कोकरा/खोखरा' के नाम से जाना जाता था।
- यही क्षेत्र धीरे-धीरे चुटिया नागपुर → चुटा नागपुर → छोटानागपुर के नाम से जाना जाने लगा।
- ब्रिटिश शासन काल में 1765 ई. से 1833 ई. तक इस क्षेत्र के लिए छोटानागपुर नाम प्रयुक्त होता रहा।
- 1834 ई. में अंग्रेजों ने इसे 'दक्षिण-पश्चिमी सीमांत एजेंसी' (South-Western Frontier Agency – SWFA) नाम से एक प्रशासनिक इकाई के रूप में गठित किया, जिसका मुख्यालय विलिकिंसनगंज या विशुनपुर (बाद का राँची) को बनाया गया।
संथाल परगना का नामकरण
संथाल परगना, झारखण्ड का दूसरा सबसे बड़ा भाग है।
- इस क्षेत्र का प्राचीनतम नाम 'नरी खण्ड' है।
- बाद में इसे 'कांकगोल' कहा जाने लगा।
- ह्वेनसांग ने संथाल परगना के मुख्य क्षेत्र राजमहल का उल्लेख 'कि-चिंग-कोईलै' के नाम से किया है।
- 'राजमहल' नामकरण मध्यकाल में हुआ।
- संथाल परगना के एक महत्वपूर्ण भाग (राजमहल, पाकुड़, गोड्डा और दुमका के कुछ हिस्से) को 'दामिन-ए-कोह' (अर्थात् पहाड़ी अंचल) कहा जाता था।
2. झारखण्ड का मध्यकालीन इतिहास (क्षेत्रीय राजवंश)
झारखण्ड मध्यकाल में क्षेत्रीय राजवंशों के अधीन था।
आरंभिक राजवंश
| राजवंश | क्षेत्र |
|---|---|
| नाग वंश | छोटानागपुर खास |
| रक्लेस वंश | पलामू |
| सिंह वंश | सिंहभूम |
बाद में उभरे राजवंश/राज्य
| राजवंश/राज्य | क्षेत्र |
|---|---|
| मान वंश | मानभूम |
| रामगढ़ राज्य | रामगढ़ |
| खड़गडीहा राज्य | खड़गडीहा |
| पंचेत राज्य | पंचेत |
| ढाल वंश | ढालभूम |
| चेरो वंश | पलामू |
नोट: क्षेत्रीय राजवंशों में छोटानागपुर खास का नाग वंश सबसे दीर्घकालिक साबित हुआ।
सल्तनत काल (1206-1526) में झारखण्ड
दिल्ली के सुल्तानों ने अपने लगभग 300 वर्षों के शासनकाल में इस क्षेत्र को कभी भी पूरी तरह आक्रांत नहीं कर सके। सल्तनत काल में झारखण्ड पर छिट-पुट ही बाहरी आक्रमण हुए:
- वीरभूमि के राजा द्वारा सिंहभूम पर आक्रमण
- मुहम्मद-बिन-तुगलक के सेनापति मलिक बया द्वारा हजारीबाग पर आक्रमण
- उड़ीसा के शासक कपिलेन्द्र गजपति द्वारा संथाल परगना पर आक्रमण
एक गाथा के अनुसार, उड़ीसा के राजा जयसिंह देव ने 13वीं सदी में स्वयं को 'झारखण्ड का शासक' घोषित किया। इसी तरह खानदेश के शासक आदिलशाह द्वितीय ने अपने सैन्य दल को झारखण्ड तक भेजा और 'झारखण्डी सुल्तान' की पदवी धारण की।
किन्तु इन सबका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा और झारखण्ड की स्वतंत्र सत्ता बनी रही।
3. मुगल काल में झारखण्ड (1526-1707)
तीसरे मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल के तीसवें वर्ष में मुगल साम्राज्य एवं झारखण्ड के बीच वास्तविक संपर्क स्थापित हुआ। तब से झारखण्ड के क्षेत्रीय राजवंश बिहार-उड़ीसा के मुगल सूबेदारों को कर देने लगे।
हालाँकि यह कर अदायगी बहुत ही अनियमित थी:
- दबाव बढ़ने पर क्षेत्रीय राजवंश सालाना कर दे देते थे और आगे देते रहने की हामी भी भर लेते थे।
- जैसे ही दबाव घट जाता था, वे कर देना बंद कर देते थे।
उत्तर मुगल काल और मराठा आक्रमण
- उत्तर मुगल काल में मुगल बादशाहों और उनके सूबेदारों की झारखण्ड पर पकड़ कमजोर पड़ गई।
- इसी काल में झारखण्ड के लिए नया खतरा मराठों के रूप में आया।
- मराठा आक्रमणों का सिलसिला 1741 ई. से शुरू होकर 1803 ई. तक चला।
- यह खतरा बड़ा रूप लेता उससे पहले ही अंग्रेज हावी हो गए।
- झारखण्ड के क्षेत्रीय राजवंशों की शक्ति इतनी क्षीण पड़ गई कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने आसानी से इस क्षेत्र को कब्जे में ले लिया।
4. अंग्रेजी शासन और जनजातीय विद्रोह
अंग्रेजों का प्रवेश (1767-1837)
झारखण्ड में अंग्रेजों के प्रवेश की प्रक्रिया 70 वर्षों (1767-1837) में पूरी हुई। अंग्रेजों एवं उनके सहयोगियों — अधिकारी-कर्मचारी, जमींदार, ठेकेदार, महाजन आदि — के झारखण्ड प्रवेश की जनजातियों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई, क्योंकि इन सबने जनजातियों के बंद जीवन में उथल-पुथल मचा दी थी और सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया था।
प्रमुख जनजातीय विद्रोह/आंदोलन
| विद्रोह/आंदोलन | समय |
|---|---|
| संथाल हुल / संथाल विद्रोह | 1855-56 ई. |
| मुण्डा उलगुलान / बिरसा का आंदोलन | 1899-1900 ई. |
1857 का विद्रोह और राष्ट्रीय आंदोलन
- 1857 के विद्रोह में झारखण्ड के लोगों ने महत्वपूर्ण भागीदारी की।
- 1885 में कांग्रेस की स्थापना के बाद लोग महात्मा गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन में एकजुट हुए।
- असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन में झारखण्ड के लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
- 1947 में भारत स्वतंत्र हो गया। झारखण्ड, बिहार का भाग बना रहा और 'दक्षिण बिहार' के नाम से जाना गया।
5. झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन
झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन का बीजारोपण 20वीं सदी के आरंभिक दशक में हुआ।
आंदोलन का नेतृत्व
- छोटानागपुर उन्नति समाज
- छोटानागपुर-संथाल परगना आदिवासी सभा (आदिवासी महासभा)
- झारखण्ड पार्टी
आंदोलन की प्रमुख अवस्थाएँ
| काल | विवरण |
|---|---|
| 1963-1973 | झारखण्ड आंदोलन के बिखराव एवं ठहराव का दौर |
| 20वीं सदी का अंतिम चतुर्थांश | झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) द्वारा नियमित आंदोलन |
| 1995 ई. | बिहार सरकार ने झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्तशासी परिषद् (JAC) की स्थापना की |
| 15 नवम्बर, 2000 ई. | झारखण्ड, भारत संघ के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया |
🏛️ राजधानी: राँची को झारखण्ड की राजधानी बनाया गया।
6. झारखण्ड का भूगोल एवं प्राकृतिक स्वरूप
झारखण्ड राज्य प्राकृतिक दृष्टि से दो मुख्य भागों में विभक्त है — छोटानागपुर और संथाल परगना। झारखण्ड एक आदिवासी बहुल राज्य है। झारखण्ड के रूप में आदिवासियों की गृहभूमि (Homeland) — जो आदिवासियों का सदियों पुराना सपना था — साकार हुआ है।
भौगोलिक विशेषताएँ
- झारखण्ड में मुख्य रूप से छोटानागपुर पठार और संथाल परगना के वन-क्षेत्र शामिल हैं।
- यह भाग पहाड़ों और जंगलों से भरा है।
- पहाड़ों में अनेक सुन्दर झरने और जलप्रपात हैं।
- उत्तरी और पूर्वी हिस्सा कम ऊँचा है; बाकी हिस्से की ऊँचाई अधिक है।
- औसत ऊँचाई: प्रायः 600 मीटर
- हजारीबाग तथा गिरिडीह जिलों में 600 से 1400 मीटर तक ऊँची पहाड़ियाँ हैं।
- झारखण्ड में अनाज की अधिक उपज नहीं है और यहाँ की आबादी भी कम है, लेकिन खनिज पदार्थ तथा जंगली चीजें बहुतायत में पाई जाती हैं।
प्रमुख पहाड़ियाँ और जलप्रपात
| स्थान | विवरण |
|---|---|
| पारसनाथ पहाड़ी (गिरिडीह) | झारखण्ड की सबसे ऊँची पहाड़ी |
| राँची जिले का सबसे ऊँचा पहाड़ | 1200 मीटर |
| हुंडू जलप्रपात (राँची) | झारखण्ड का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध जलप्रपात (100 मीटर ऊँचाई) |
| नेतरहाट की चोटी (पलामू) | 1200 मीटर ऊँची |
| दलमा पहाड़ी (सिंहभूम/धनबाद) | क्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी |
- यहाँ गर्म जल के अनेक झरने हैं।
- विंध्य व कैमूर की पर्वत श्रेणियों ने झारखण्ड को उत्तर से होने वाले आक्रमणों से सदैव सुरक्षा प्रदान की।
- प्राचीन काल में गुप्त शासकों एवं गौड़ शासक शशांक को छोड़कर किसी राजवंश ने इस क्षेत्र पर अधिक समय तक शासन नहीं किया।
7. झारखण्ड की नदियाँ
प्रमुख नदियाँ
उत्तर-कोयल, दक्षिण-कोयल, सुवर्णरेखा, दामोदर, बराकर, शंख, अमानत और कंसाई।
क्षेत्रवार नदियाँ
| क्षेत्र | नदियाँ |
|---|---|
| पलामू एवं गढ़वा | कनहर (दक्षिण-पश्चिमी सीमा) |
| सिंहभूम | उत्तर करो, दक्षिण करो, रोरो, देव, कोइना |
| धनबाद | धलकिशोर |
| हजारीबाग एवं गिरिडीह | सकरी, मोहनी, नीलांजन |
| संथाल परगना | गंगा, गुमानी, बंसलोई, ब्राह्मणी, अजय, मोर |
8. झारखण्ड के पशु एवं वन्यजीव
- झारखण्ड के पशु प्रायः कमजोर और कद के नाटे होते हैं।
- बैल के अलावा भैंसा भी काफी तादाद में हल में जोते जाते हैं।
- राँची जिले में आदिम जाति के लोग कभी-कभी गाया को भी हल में जोतते हैं।
- मुण्डा जाति के लोग दूध के लिए गाय प्रायः नहीं पालते; उनका कहना है कि दूध गाय के बच्चे के लिए है।
- हजारीबाग और राँची के स्थानीय लोगों में भैंस पालने और उसकी नस्ल बढ़ाने की चाल नहीं है।
पालतू जानवर
हाथी, घोड़ा, कबरी, भेड़, गधा तथा सूअर आदि।
वन्यजीव
बाघ, चीते, भालू, भेड़िये, सूअर आदि काफी तादाद में पाए जाते हैं। हर वर्ष सैकड़ों पशु और मनुष्य इनके शिकार होते हैं। हालाँकि इन जंगली जानवरों की संख्या में काफी कमी आने लगी है।
9. आवास-प्रवास
झारखण्ड एक पिछड़ा हुआ भू-भाग होने के कारण प्रवासियों का एक जबर्दस्त अड्डा बन गया। ये लोग यहाँ की जमीन, खान, उद्योग-धंधे, व्यापार और नौकरियों में काफी दखल जमाए हुए हैं।
- बिहार, बंगाल तथा पंजाब से आए लोगों की संख्या अधिक है।
- ये लोग अधिकतर छोटी-छोटी नौकरियाँ अथवा व्यापार करते हैं।
10. जीवनकाल एवं जनसांख्यिकी
- देश के अन्य उन्नतिशील भागों की अपेक्षा यहाँ के लोग बहुत कम उम्र तक जीते हैं।
- पिछली जनगणना के अनुसार झारखण्ड में 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति हजार में 60 थे।
- बाल-मृत्यु भी देश के अन्य भागों की अपेक्षा यहाँ अधिक है।
- ज्यादा हिफाजत करने पर भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की मृत्यु अधिक होती है।
11. धर्म और जातियाँ
धार्मिक विभाजन
- हिन्दुओं की संख्या अधिक है और मुसलमानों की कम।
- ईसाई धर्म प्रचारकों का अड्डा होने के कारण ईसाइयों की संख्या बड़ी है।
- सिक्खों, बौद्धों तथा जैनियों की संख्या मामूली है।
हिन्दू प्रमुख जातियाँ
ब्राह्मण (सर्वाधिक) → राजपूत → कोयरी → दुसाध → ग्वाला → चमार → तेली → भूमिहार ब्राह्मण आदि।
छः में एक आदमी यहाँ हरिजन है।
12. झारखण्ड की आदिम जातियाँ (जनजातियाँ)
झारखण्ड आदिम जाति बहुल क्षेत्र है। मुंडा और द्राविड़ — इनकी दो मुख्य श्रेणियाँ हैं।
21 मुख्य जातियाँ
संथाल, मुण्डा, ओराँव, भुइयाँ, हो, भूमिज, खरिया, खरवार, चेरो, कोरवा, करमाली, बिरहोर, असुर, बिरजिया, सबर इत्यादि।
इन जातियों में अधिकांश लोग अपने को हिन्दू बताते हैं। शेष अपने को ईसाई और सरना धर्म को मानने वाले हैं।
13. खेती और फसल उत्पादन
झारखण्ड जंगलों और पहाड़ों से भरा है। यहाँ की जमीन का सिर्फ एक-चौथाई भाग जोता-बोया जाता है। झारखण्ड खेती के लिए नहीं, बल्कि खनिज-पदार्थ के लिए प्रसिद्ध है।
फसलों के प्रकार
| फसल | मुख्य उत्पादन |
|---|---|
| रबी (सबसे मुख्य) | गेहूँ, जौ, चना, अरहर, तीसी |
| भदई | धान, मकई, मडुआ |
| अगहनी | मुख्यतः धान |
अन्य कृषि विवरण
- दो-तीन फसलवाली जमीन बहुत ही कम है।
- बहुत-सी जमीन दो, तीन और चार साल परती रहने के बाद बोने के काबिल होती है।
- गेहूँ की खेती कम और मडुआ की खेती बहुत होती है।
- धनबाद और हजारीबाग जिलों में बाजरा उपजाया जाता है।
- तेलहन: तीसी, तिल और सुरगुजा मुख्य हैं।
- रूई की खेती: दुमका, राँची, धनबाद, हजारीबाग तथा पलामू जिलों में होती है। आदिम जाति के लोग अपने यहाँ की रूई से बने कपड़े अधिक पसन्द करते हैं।
- मसाले: पलामू में होते हैं; सबसे अधिक मिर्च होती है।
- चाय: राँची जिले में उपजती है।
- सिंचाई: लगभग नहीं के बराबर; धनबाद, पलामू और सिंहभूम जिलों में थोड़ी-बहुत व्यवस्था है।
14. झारखण्ड में खनिज पदार्थ एवं उद्योग
लोहा तथा कोयला आदि खनिज पदार्थ काफी मात्रा में पाए जाने के कारण उद्योग-धंधों के बढ़ने में काफी सुविधा हुई।
प्रमुख उद्योग
- इंजीनियरिंग, लाह, बिजली, सिमेंट, लोहा, अबरख, ताम्बा आदि से संबद्ध अनेक कारखाने
- लाह उद्योग में हजारों लोग कार्यरत
- सिंहभूम तसर-व्यापार का केंद्र है
- टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना 1907 में हुई
- बोकारो में लोहा और इस्पात का बहुत बड़ा कारखाना
- कत्था हजारीबाग और पलामू में तैयार किया जाता है
15. रेलवे एवं सड़क परिवहन
प्रमुख रेलवे लाइनें
- झारखण्ड से पार होने वाली प्रमुख रेलवे लाइन ग्रैंड कॉर्ड लाइन है।
- झरिया-धनबाद के कोयला-क्षेत्र में कई छोटी-छोटी लाइनें फैली हुई हैं।
- ग्रैंड कॉर्ड लाइन के गोमोह स्टेशन से बरकाकाना लूप लाइन लातेहार, डालटेनगंज होती हुई सोन-ईस्ट बैंक से मिलती है (लंबाई: 400 किमी)।
- राँची से लोहरदगा तक एक छोटी लाइन है।
- कोलकाता-मुंबई लाइन सिंहभूम जिले के चकुलिया स्टेशन के पास झारखण्ड में घुसती है और सरायकेला के पास बाहर चली जाती है।
- टाटानगर से बादाम पहाड़ तक एक लाइन (आरंभ में करीब 39 किमी झारखण्ड के अंदर)।
- खरसावाँ से गुआ तक एक लाइन (दूरी: 100 किमी)।
- आसनसोल से चंडिल होकर सीनी जंक्शन में मुंबई जानेवाली लाइन मिलती है।
- चांडिल से मुरी जंक्शन तथा राँची होती हुई राउरकेला तक एक लाइन गई है।
झारखण्ड में सड़कें कम हैं, पर यहाँ सड़कों की दशा अच्छी है।
16. झारखण्ड में शिक्षा
शिक्षा के क्षेत्र में झारखण्ड पिछड़ा हुआ इलाका है, फिर भी बिहार की तुलना से काफी आगे है।
शिक्षा के आँकड़े
- धार्मिक संप्रदाय के हिसाब से ईसाइयों में शिक्षा-प्रचार सबसे अधिक है।
- 5 वर्ष से अधिक उम्र वाले हजार ईसाइयों में 360 पढ़े-लिखे हैं।
- आदिम जातियों में हजार में 260 व्यक्ति पढ़े-लिखे हैं।
शिक्षण संस्थाएँ
- झारखण्ड में चार विश्वविद्यालय हैं।
- उच्च, माध्यमिक और प्राइमरी विद्यालयों की संख्या पर्याप्त है।
- करीब-करीब आधे स्कूल ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जाते हैं।
- मिशनरियों ने स्त्री-शिक्षा का बहुत प्रचार किया है।
भाषाएँ
- पढ़े-लिखे लोगों की मुख्य भाषा हिन्दी है।
- संथाल परगना में प्रायः 12 प्रतिशत लोग बंगला बोलते हैं।
- शुद्ध मगही हजारीबाग जिले के उत्तरी भाग और पलामू जिले के पूर्वी भाग में बोली जाती है।
- पूर्वी मगही हजारीबाग, राँची, धनबाद और सिंहभूम के कुछ हिस्सों में बोली जाती है।
- राँची की पूर्वी मगही का एक रूप 'पंच-परगनिया' है, जिसे सिली, बरंडा, राहे, बुंडू और तामड़िया भी कहते हैं।
17. प्रागैतिहासिक काल: पाषाण काल (25,00,000 ई.पू. – 1,000 ई.पू.)
पाषाण काल को तीन युगों में बाँटा जाता है: पुरा/पूर्व (Paleo), मध्य (Meso) एवं नव (Neo)। झारखण्ड में तीनों युगों के साक्ष्य मिलते हैं।
17.1 पुरापाषाण युग (Paleolithic Age)
- जीवनशैली: आखेटक व खाद्य-संग्रहक
- अवशेष प्राप्त क्षेत्र: दुमका, देवघर, हजारीबाग, बोकारो, राँची, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम (नदियों के किनारे)
17.2 मध्यपाषाण युग (Mesolithic Age)
- जीवनशैली: आखेटक व पशुपालक / सूक्ष्मपाषाणोपकरण (Microlith) संस्कृति
- अवशेष प्राप्त क्षेत्र: पलामू, दुमका, धनबाद, राँची, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम
17.3 नवपाषाण युग (Neolithic Age)
- जीवनशैली: खाद्य उत्पादक
- अवशेष प्राप्त क्षेत्र: राँची, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम
प्रागैतिहासिक झारखण्ड की विशेषताएँ
- प्रागैतिहासिक काल में झारखण्ड घनघोर महावनों से आच्छादित था।
- वृक्षों की सघनता ऐसी थी कि धरती पर पाँच-छः मीटर से अधिक कुछ भी नहीं दिखाई देता था।
- यह स्थिति आज से प्रायः बीस हजार वर्ष पूर्व की थी।
- झारखण्ड बाह्य जगत से सर्वथा कटा हुआ कभी नहीं रहा; अनंत काल से देश के अन्य भागों से जातीय और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा।
- विंध्य और कैमूर की श्रेणियों ने इसे उत्तर से होने वाले आक्रमणों से सदैव अभयदान दिया।
- गुप्त शासकों एवं गौड़ शासक शशांक को छोड़कर प्राचीन भारत के किसी राजवंश ने इस भाग पर अधिक समय तक राज्य नहीं किया।
- तुर्क विजेता अपने तीन सौ वर्षों के शासनकाल में इस क्षेत्र को कभी भी आक्रांत न कर सके।
- मुगल सम्राट भी कभी-कभी ही यहाँ प्रवेश कर सके।
- इसके वनों और पर्वतों ने भारतीय आदिम निवासियों के समुदायों को शरण दी — जैसे मुण्डा, हो, उराँव, संथाल, चेरो तथा खरवार आदि।
- द्राविड़ों और आर्यों द्वारा अधिक उपजाऊ प्रदेशों से निकाले जाने पर ये यहीं आकर बस गए।
नवपाषाण युग की खोजें
- जब सिंधु-घाटी में कांस्यकालीन संस्कृति का विकास हो रहा था, उसी समय झारखण्ड में नवपाषाण संस्कृति विकसित हुई थी।
- यहाँ चिकने पॉलिश किए गए पाषाण-शिल्प-उपकरण तथा कुठार प्राप्त हुए हैं।
- बुरहादी गाँव में 1870 में बॉल को पत्थर का 'सेल्ट' मिला।
- बुरजू में एस.सी. राय को स्लेटी पत्थर की पॉलिश की हुई छेनी मिली।
- 1868 में कप्तान बिचींग को चाईबासा के निकट रोरो नदी के तट पर नव-पाषाण युग के उपकरण मिले (प्रस्तर-चाकुओं की प्रधानता)।
- 1917 में सी.डब्ल्यू. सेंडरसन को संजय नदी के तट पर इसी प्रकार की चीजें मिलीं।
- बुरूहातू में एस.सी. राय ने स्लेट की पत्थर की छेनी तथा क्वार्ज पत्थर की पॉलिश की हुई छेनी पाई।
- दरगामा गाँव में 1915 ई. में एक ग्रामीण को ताम्बा के 5 'सेल्ट' मिले।
- वोरमैन ने नव-पाषाणकालीन हस्तकुठारों को 12 प्रकार का पाया; अधिकांश प्रकार झारखण्ड में पाए गए।
गोल हस्तकुठार और अन्य शिल्प-उपकरण संकेत देते हैं कि इस क्षेत्र में नवपाषाणकालीन सांस्कृतिक प्रभाव दो बार क्रम से आया होगा — संभवतः पहला सांस्कृतिक अतिक्रमण 1500 ई.पू. के लगभग और दूसरा इससे भी पहले।
18. नवपाषाण युग के बाद झारखण्ड (धातु युग)
ताम्र-पाषाण युग (Chalcolithic Age)
- पाषाण (पत्थर) के साथ-साथ ताम्र/ताँबा (धातु) के उपकरणों का प्रयोग।
- उस समय की असुर, बिरजिया, बिरहोर जनजातियाँ ताँबे के खानों से अयस्क निकालकर उसे गलाने और उससे उपकरण बनाने की विद्या से परिचित थीं।
- झारखण्ड के कई स्थलों से ताँबे की कुल्हाड़ियाँ मिली हैं।
- हजारीबाग के बाहरगंडा स्थान से ताँबे की 49 खानों के अवशेष मिले हैं।
कांस्य युग (Bronze Age)
- कांस्य/काँसा का निर्माण ताँबे में टिन मिलाकर किया जाता था।
- छोटानागपुर क्षेत्र की असुर और बिरजिया जनजाति इस युग की सूत्रधार थीं।
लौह युग (Iron Age)
- लौह युग के सूत्रधार भी असुर और बिरजिया जनजाति ही थे।
- छोटानागपुर की असुर व बिरजिया जनजातियों ने उत्कृष्ट लौह तकनीक का विकास किया।
- एक इतिहासविद् के अनुसार छोटानागपुर का लोहा सुदूर मेसोपोटामिया (आज का इराक) तक भेजा जाता था, जहाँ दमिश्क में इससे तलवारें बनाई जाती थीं।
दमिश्क की तलवारें इतिहास-प्रसिद्ध हैं। इससे झारखण्ड के वैदेशिक संपर्क की पुष्टि होती है।
19. झारखण्ड में जनजातियों का प्रवेश
प्राचीनतम जनजातियाँ
असुर, बिरजिया, बिरहोर एवं खड़िया झारखण्ड की प्राचीनतम जनजातियाँ हैं, और इनमें भी असुर सबसे प्राचीन जनजाति है।
जनजातियों के आगमन का क्रम
| क्रम | जनजाति | विवरण |
|---|---|---|
| 1 | असुर, बिरजिया, बिरहोर, खड़िया | प्राचीनतम |
| 2 | कोरवा | प्राचीनतम एवं बाद की जनजातियों के बीच |
| 3 | मुण्डा, उराँव, हो | बाद की जनजातियाँ |
| 4 | चेरो, खरवार, भूमिज, संथाल | और भी परवर्ती काल |
खड़िया जनजाति
- सिंहभूम तथा मानभूम में बहुत कम संख्या में बचे हैं।
- छोटानागपुर खास में उनकी बस्तियाँ हैं; सर्वश्रेष्ठ स्थिति दक्षिण कोयल नदी के निकट है।
- प्राचीनकाल में ये रोहतास से लेकर पाटलिपुत्र तक फैले हुए थे; वहाँ से निकाले जाने पर दक्षिण कोयल क्षेत्र में चले आए।
बिरहोर जनजाति
- संभवतः कैमूर की पहाड़ियों से होते हुए छोटानागपुर में प्रविष्ट हुए।
- बिरजिया तथा असुरों की तरह प्रारंभिक जनजातियों में एक।
- स्वयं असुर नव-पाषाणकाल से लेकर लौह युग तक छोटानागपुर में फलते-फूलते रहे।
मुण्डा जनजाति
- छोटानागपुर में प्रवेश का काल तथा मार्ग दोनों अभी तक अनिश्चित हैं।
- बी.सी. मजूमदार के अनुसार इन्होंने पूर्ववर्ती जनजातियों को पूर्व-दक्षिण की ओर धकेलकर छोटानागपुर खास पर कब्जा कर लिया।
- मुण्डाओं की परंपरा के अनुसार ये लोग आज के मध्य भारत और उत्तर प्रदेश क्षेत्र से तब भागे जब वहाँ आर्यों का आगमन हुआ।
- आर्यों के विस्तार के बाद उन्हें पहले रोहतास क्षेत्र, बाद में छोटानागपुर आना पड़ा।
उराँव (द्राविड़) जनजाति
- मुण्डाओं के बाद छोटानागपुर की प्रमुख जनजाति।
- संबंध दक्षिण भारत तथा पूरब के द्वीपों की जातियों से है।
- दक्षिण भारत से चलकर उत्तर-पश्चिम होते हुए रोहतास क्षेत्र में पहुँचे; वहाँ चेरो-खरवारों द्वारा भगाए जाने पर छोटानागपुर में प्रविष्ट हुए।
- मुख्यतः छोटानागपुर खास तथा पलामू क्षेत्र में बसे।
- उराँव की भाषा कुरुख और कन्नड़ तथा तमिल के अनेक शब्दों में एकरूपता पाई गई है।
- संभव है कि मुण्डा और उराँव एक ही समय में उत्तरी-पश्चिमी भारत से चले हों — यह घटना आर्यों के आने से पहले की थी।
बौद्ध अवशेष
- झारखण्ड के जिस भाग को आजकल धनबाद के नाम से जाना जाता है, वह बौद्ध-धर्म का एक महत्वपूर्ण स्थान था।
- टी. ब्लॉश (Archaeological Survey of India Report, Bengal Circle, 1903) ने यहाँ पाँच-सात किलोमीटर क्षेत्र में बौद्ध अवशेष देखे।
- पुरूलिया (अब बंगाल में) से 40 किमी दक्षिण-पूर्व में पाकबीरा है; 1865 ई. में आर.सी. बोकन ने वहाँ बौद्ध खंडहर देखे।
- पाकबीरा और बाहमसिया गाँवों के बीच लाथेनटोंगरी नामक पहाड़ी है; यहाँ बेगलर ने कई चैत्यों के अवशेष देखे।
जनजातियों के बसावट का अंतिम क्रम
- 1,000 ई.पू. तक चेरों, खेरवारों व संथालों को छोड़कर झारखण्ड में उपलब्ध सभी जनजातियाँ आ चुकी थीं।
- पलामू में चेरो-खरवार तथा हजारीबाग में संथाल आकर बसे।
- ब्रिटिश काल में संथाल, संथाल परगना में आकर बसे।
🔍 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: झारखण्ड का शाब्दिक अर्थ क्या है?
झारखण्ड का शाब्दिक अर्थ है "वन प्रदेश" — झार/झाड़ (वन) + खण्ड (प्रदेश)।
प्रश्न 2: झारखण्ड राज्य कब बना?
15 नवम्बर, 2000 ई. को झारखण्ड भारत संघ के 28वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
प्रश्न 3: झारखण्ड की राजधानी क्या है?
राँची झारखण्ड की राजधानी है।
प्रश्न 4: झारखण्ड की सबसे ऊँची पहाड़ी कौन-सी है?
पारसनाथ पहाड़ी (गिरिडीह जिला) झारखण्ड की सबसे ऊँची पहाड़ी है।
प्रश्न 5: झारखण्ड की प्रमुख जनजातियाँ कौन-सी हैं?
संथाल, मुण्डा, ओराँव, हो, भूमिज, खरिया, असुर, बिरहोर, चेरो, कोरवा आदि प्रमुख जनजातियाँ हैं।
प्रश्न 6: झारखण्ड की प्राचीनतम जनजाति कौन-सी है?
असुर जनजाति झारखण्ड की सबसे प्राचीन जनजाति मानी जाती है।
📝 निष्कर्ष: झारखण्ड की जनजातीय संस्कृति भारतीय समाज की एक अमूल्य निधि है। सुदूर अतीत से इसकी अविरल धारा आज तक प्रवाहित होती आई है। यदि यह लेख उपयोगी लगा हो, तो कृपया इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें और कमेंट में अपनी राय दें।
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